जानें, ज्वाला गुट्टा के पिता क्यों घर बेचने को हुए मजबूर




रुपेश सिंह, नई दिल्लीअमूमन खिलाड़ी खेल से जुड़ी परेशानियों और मुद्दों पर तब तक कुछ नहीं बोलते हैं जब तक कि वे उस खेल से रिटायर नहीं हो जाते। लेकिन भारतीय बैडमिंटन में डबल्स वर्ग की शीर्ष खिलाड़ियों में शुमार रहीं ने अपने खेल के दिनों की शुरुआत से ही गलत और सही चीजों पर हमेशा बेबाक राय रखी। हाल ही में ‘हैदराबाद एनकाउंटर’ पर उनके ट्वीट ने खूब सुर्खियां बटोरीं। ‘ज्वाला गुट्टा अकैडमी ऑफ एक्सिलेंस’ के लॉन्च के मौके पर ज्वाला ने NBT से खास बातचीत की।

�� क्या खिलाड़ियों को मुद्दों पर खासकर ‘विवादास्पद’ पर अपनी राय रखनी चाहिए। क्या ऐसा करने से उसका खेल पर से फोकस नहीं हटेगा?
नहीं ऐसा नहीं। मैं तो शुरू से ऐसा करते आई हूं साथ ही खेल पर अपना फोकस भी बनाए रखा। खिलाड़ी अपनी मेहनत की खाता है, किसी की दया पर वह नहीं टिका होता है। अगर किसी मसले पर प्लेयर का कोई मत है तो उसे सामने रखना चाहिए। अगर आप एक बड़े खिलाड़ी हैं तो जरूर आपके फैंस भी होंगे जो यह जानना चाहेंगे कि आपकी सोच क्या है।

खेल में ही कई गलत चीजें होती हैं, लेकिन खिलाड़ी इन मसलों को अपनी मूक सहमती दे देते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। जो सही समय पर किसी गलत चीजों के खिलाफ नहीं बोलते हैं तो उन्हें बाद में इसके खिलाफ शिकायत करने का भी अधिकार नहीं रहता है।

�� हैदराबाद एनकाउंटर पर आपने ट्वीट करने से पहले खुद को कितना वक्त दिया? क्या कुछ सोचा?जरा भी नहीं। मैंने जैसे खबर देखी, मेरे मन में कई सवाल उठने लगे। बस उसी वक्त मैंने ट्वीट कर दिया। मैं जानती थी कि हो सकता है कि कुछ लोग उसे पसंद करेंगे और कुछ नहीं भी पसंद करेंगे, लेकिन आपके पास ओपिनियन होना चाहिए। उस एनकाउंटर को लेकर मैंने वही ट्वीट किया जो मुझे सही लगा।

कुछ ने तो इस ट्वीट को अन्य प्लेयर्स के साथ जोड़ दिया। कुछ ने कहा कि आपने साइना नेहवाल को कॉन्ट्रिडिक्ट करने के लिए ऐसा ट्वीट किया। जबकि सच यह है कि मेरा ट्वीट साइना के ट्वीट से करीब आधे घंटे पहले आया था। साइना ने उस एनकाउंटर पर खुशी जाहिर की तो वह उनका मत था और मैंने नाखुशी जाहिर की तो यह मेरा मत था। इसमें विवाद वाली क्या बात है।

�� गोपीचंद से आपकी नाखुशी किसी से छिपी नहीं है। आप किसी और शहर में भी अपनी अकैडमी खोल सकती थीं, लेकिन आपने हैदराबाद को ही चुना जहां पहले से गोपीचंद अकैडमी मौजूद है। बच्चे आपकी अकैडमी से पहले गोपीचंद अकैडमी ही जाना चाहेंगे।मुझे न सरकार से मदद मिली है और न ही किसी तरफ से। जो किया है मैंने खुद किया है। मेरे पिता जी ने मेरा अकैडमी खोलने का सपना पूरा करने के लिए अपना घर भी बेच दिया है। जब अपने ही पैसों से मुझे अकैडमी खोलनी थी तो मैंने हैदराबाद को ही चुना। प्रफेशनली हैदराबाद ही मेरा घर है। अब बच्चे मेरी अकैडमी से पहले किसी और अकैडमी को चुनते हैं तो इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं दूसरा विकल्प बनकर भी खुश हूं।

�� हाल ही में कई बार की नैशनल चैंपियन अपर्णा बालन ने सैग खेलों के लिए नैशनल टीम में खुद के नहीं चने जाने पर चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए थे। आप इससे कितना इत्तेफाक रखती हैं?अगर धुआं है तो कहीं आग भी होगी। भारतीय टीम सिलेक्शन को लेकर अगर कोई सवाल खड़े करता है तो जरूर वहां कुछ न कुछ तो है। आप सभी जानते हैं कि नैशनल टीम में सिर्फ एक ही अकैडमी के प्लेयर्स चुने जाते हैं। मैं इस भ्रम को तोड़ना चाहती हूं कि नैशनल टीम में जाने के लिए सिर्फ एक किसी खास अकैडमी का आपको स्टुडेंट होने की जरूरत है।



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